मधुमेह और हाइपरटेंशन के बीच संबंध | Diabetes and Hypertension in Hindi

Medically Reviewed By DR. RASHMI GR , MBBS, Diploma in Diabetes Management नवम्बर 26, 2023

मधुमेह और हाइपरटेंशन दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों ही बीमारी लाइफस्टाइल से जुड़ी हुई हैं। यदि कोई भी दोनों में से किसी एक बीमारी से भी पीड़ित है तो दूसरे का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए डायबिटीज और हाइपरटेंशन दोनों को समझना बहुत जरूरी है, अगर कोई दोनों ही समस्याओं से ग्रसित है तो प्रत्येक की स्थिति दूसरे को खराब बनाती है।

इस ब्लॉग में मधुमेह और हाइपरटेंशन के मूल कारणों और शक्तिशाली उपचारों की पहचान करके उनके बीच जटिल संबंधों पर प्रकाश डाला गया है। इन दोनों विकारों को एक साथ मैनेज किया जा सकता है।

मधुमेह क्या है ?

मधुमेह एक लॉन्ग-टर्म मेटाबॉलिज्म डिजीज है जो ब्लड शुगर (ग्लूकोज) लेवल को कंट्रोल करने की शरीर की क्षमता को बाधित करता है। मधुमेह के दो प्रकार हैं-  टाइप 1 मधुमेह एक ऑटोइम्यून समस्या जहां अग्न्याशय इंसुलिन का उत्पादन कम करता है, और टाइप 2 मधुमेह जिसकी विशेषता इंसुलिन रेजिस्टेंस है। मधुमेह विश्व स्तर पर लाखों लोगों को प्रभावित करता है। जिसका जीवनशैली और स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

हाइपरटेंशन से क्या तात्पर्य है?

हाइपरटेंशन जिसे हाई ब्लड प्रेशर के रूप में भी जाना जाता है एक चिकित्सीय स्थिति है जहां धमनी की दीवारों पर ब्लड का फोर्स लगातार बढ़ा हुआ रहता है। यह स्थिति हार्ट, आर्टरी (धमनी) और जरूरी अंगों पर दबाव डालती है, जिससे हार्ट डिजीज, स्ट्रोक और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। हाई ब्लड प्रेशर का जल्दी पता लगना और उसके मैनेजमेंट के लिए नियमित निगरानी बहुत जरूरी है।

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हाई ब्लड प्रेशर की पहचान कैसे करें?

अधिकांश व्यक्तियों में हाइपरटेंशन के कोई लक्षण नहीं होते हैं। एक साधारण ब्लड प्रेशर जांच से किसी व्यक्ति में हाइपरटेंशन का पता चलता है।

ब्लड प्रेशर के दो प्रकार सिस्टोलिक और डायस्टोलिक को ब्लड प्रेशर रीडिंग में संख्याओं के रूप में दर्शाया जाता है।

  • सिस्टोलिक- यह मान सबसे ऊपर प्रदर्शित होता है। यह धड़कन के दौरान दिल पर पड़ने वाले सबसे अधिक दबाव को दर्शाता है।
  • डायस्टोलिक- यह मान नीचे दिखता है। दिल की धड़कनों के बीच यह धमनियों में पड़ने वाले दबाव को दर्शाता है।

हाइपरटेंशन के प्रकार और ब्लड शुगर से इसका संबंध

प्राइमरी हाइपरटेंशन समय के साथ बिना पता चले धीरे-धीरे विकसित होता है वहीं सेकेंडरी हाइपरटेंशन किसी तरह की किडनी की समस्या या हार्मोनल डिजीज के कारण होता है। दिलचस्प बात यह है कि ये अलग-अलग प्रकार के हाइपरटेंशन इनका ब्लड शुगर लेवल के साथ कैसा संबंध है खासकर जब किसी को मधुमेह हो। शुगर और हाई ब्लड प्रेशर अक्सर साथ-साथ चलते हैं, उनका संबंध शरीर के अंदर ब्लड प्रेशर और शुगर रेगुलेशन के बीच संघर्ष को उजागर करता है।

प्राइमरी हाइपरटेंशन

प्राइमरी हाइपरटेंशन हाई ब्लड प्रेशर के सबसे आम प्रकारों में से एक है और यह समय के साथ धीरे-धीरे विकसित होता है। सेकेंडरी हाइपरटेंशन से अलग प्राइमरी हाइपरटेंशन की स्पष्ट पहचान करना थोड़ा मुश्किल होता है। यह आनुवांशिकी, उम्र और लाइफस्टाइल जैसे कारकों के संयोजन के कारण उभरता है। प्राइमरी हाइपरटेंशन का शुरुआती चरण में कोई लक्षण नहीं दिखता है। क्रमिक प्रगति के कारण अगर इसका इलाज समय पर न हो तो इसके गंभीर परिणाम होते हैं इसलिए इसे “साइलेंट किलर” के नाम से भी जाना जाता है।

सेकेंडरी हाइपरटेंशन

प्राइमरी हाइपरटेंशन  से अलग के सेकेंडरी हाइपरटेंशन के लक्षण पूरी तरह से दिखाई पड़ते हैं। जिनमे किडनी से जुड़ी समस्या, हार्मोन का असंतुलन, ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया शामिल हो सकता है। सेकेंडरी हाइपरटेंशन के उपचार के लिए मूल कारण को ध्यान में रखना होता है, जिसे मैनेज करने पर ब्लड प्रेशर के लेवल में कमी आ सकती है। इस प्रकार के हाइपरटेंशन बॉडी सिस्टम और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में उनकी भूमिका के बीच कठिन संबंधों को हाईलाइट करते हैं।

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शुगर और हाई ब्लड प्रेशर कैसे एक दूसरे से जुड़े होते हैं 

जोखिम कारक

शुगर और हाइपरटेंशन के विकास में मोटापा एक आम कारक है। शरीर का अतिरिक्त वजन इंसुलिन रेजिस्टेंस में योगदान देता है और कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम पर दबाव डालता है, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। सोडियम, शुगर और प्रोसेस्ड चीजों से भरपूर अनहेल्दी डाइट दोनों स्थितियों को और बढ़ा देता है। बिना किसी फिजिकल एक्टिविटी की खराब लाइफस्टाइल खतरे को बढ़ा देती है। जिससे हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाना सबसे जरूरी हो जाता है।

इंसुलिन रेजिस्टेंस और हाइपरटेंशन

इंसुलिन रेजिस्टेंस टाइप 2 मधुमेह से जुड़ा हुआ है। यह ग्लूकोज रेगुलेशन को बाधित करने के साथ-साथ ब्लड वेसल्स के काम को भी प्रभावित करता है। इंसुलिन रेजिस्टेंस में ब्लड वाहिकाएं सिकुड़ सकती हैं जिससे ब्लड प्रेशर का लेवल बढ़ सकता है। इंसुलिन रेजिस्टेंस वाले व्यक्तियों में अक्सर देखा जाता है कि हाई इंसुलिन लेवल ब्लड वाहिका को ख़राब कर सकता है, जिससे ब्लड प्रेशर पर प्रभाव पड़ सकता है। इस कारण से अलग-अलग प्रकार के हाइपरटेंशन हो सकते हैं।

सूजन और ब्लड प्रेशर

शुगर में होने वाली सूजन इन दोनों स्थितियों को जोड़ने का काम करती है। सूजन से ब्लड वाहिकाओं का लचीलापन कम हो सकता है और एथेरोस्क्लेरोसिस के विकास को बढ़ावा मिल सकता है। जिस कारण हाइपरटेंशन की समस्या हो सकती है। सी-रिएक्टिव जैसे सूजन संबंधी मार्कर शुगर और हाई ब्लड प्रेशर वाले व्यक्तियों में कार्डियोवैस्कुलर खतरे के बढ़ने का संकेत देते हैं।

मधुमेह और हाइपरटेंशन के बीच संबंध पर चर्चा करते समय विभिन्न प्रकार के हाइपरटेंशन पर बात करना जरूरी है। हाइपरटेंशन जिसे आमतौर पर हाई ब्लड प्रेशर(BP) कहा जाता है, ब्लड शुगर के लेवल के नाजुक संतुलन से जुड़ा होता है। शुगर और हाइपरटेंशन के बीच परस्पर क्रिया इस बात का खुलासा करती है कि ये स्थितियाँ कैसे आपस में जुड़ती हैं।

सामान्य बीपी और शुगर के लेवल को बनाए रखना संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। उन चीजों की खोज करना काफी दिलचस्प है जिनके कारण से बीपी(BP) और शुगर परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। एक अहम सवाल यह उठता है कि क्या चीनी ब्लड प्रेशर बढ़ाती है? बीपी और शुगर की गतिशीलता को समझ करके हम हेल्थ मैनेजमेंट के लिए एक बढ़िया तरीके को अपनाते हुए इस बात की गहन जानकारी प्राप्त कर सकते हैं कि शुगर और हाइपरटेंशन कैसे एक साथ जुड़े होते हैं।

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सामान्य ब्लड प्रेशर(BP) और शुगर के लेवल को कंट्रोल करना

सामान्य ब्लड प्रेशर और शुगर के लेवल को बनाए रखना संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। सामान्य ब्लड प्रेशर के लिए मानक 120/80 मिमी एचजी की रीडिंग है और  सामान्य ब्लड शुगर लेवल में 70-99 मिलीग्राम/डीएल के अंदर फास्टिंग ग्लूकोज लेवल शामिल होता है। जब ये लेवल इस सीमा के भीतर रहते हैं तो शरीर अच्छे ढंग से काम करता है।  जिससे किसी भी तरह का खतरा कम हो जाता है।

ब्लड प्रेशर और शुगर के बीच का संबंध आसान नहीं है।

एक में व्यवधान(समस्या) से दूसरे पर असर पड़ सकता है, जिससे शुगर और हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्या हो सकती है।

शुगर और हाइपरटेंशन को एक साथ कैसे मैनेज करें

हेल्दी डाइट

शुगर और हाइपरटेंशन दोनों को मैनेज करने के लिए हेल्दी डाइट अपनाना बहुत जरूरी है। सब्जियां, फल, साबुत अनाज, लीन प्रोटीन और हेल्दी फैट बीपी(BP) और शुगर को कंट्रोल करने के साथ जरूरी पोषक तत्व भी प्रदान करते हैं। सोडियम का सेवन कम करने और पीने वाली मीठी चीजों से परहेज करने से दोनों स्थितियों को बेहतर ढंग से मैनेज करने में मदद मिलती है।

नियमित शारीरिक गतिविधि

शुगर और हाइपरटेंशन को साथ में मैनेज करने के लिए फिजिकल एक्टिविटी बहुत जरूरी है। फिजिकल एक्टिविटी इंसुलिन सेंसटिविटी को सही करता है, कोशिकाओं द्वारा ग्लूकोज उपयोग को बढ़ावा देता है, कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम को मजबूत करता है, ब्लड वाहिका को सही रखता है और ब्लड प्रेशर के लेवल को कम करता है। प्रत्येक सप्ताह कम से कम 150 मिनट के मॉडरेट लेवल की फिजिकल एक्टिविटी से पर्याप्त लाभ मिलता है।

दवा और निगरानी

कुछ मामलों में मधुमेह और हाई ब्लड प्रेशर को प्रभावी ढंग से मैनेज करने के लिए दवा जरूरी है। दोनों स्थितियों को कंट्रोल में रखने के लिए निर्धारित दवाओं का पालन करना जरूरी है। शुगर और ब्लड प्रेशर के लेवल की नियमित निगरानी व्यक्तियों को अपनी स्थिति पर नज़र रखने और जरूरी एडजस्टमेंट करने में सशक्त बनाती है। हेल्थ सर्विस प्रोवाइडर की सहायता से इन स्थितियों को मैनेज करने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण (सम्पूर्ण नजरिया – Global approach) मिल जाता है।

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क्या शुगर बढ़ने से बीपी बढ़ता है?

लंबे समय तक शुगर बढ़ने से ब्लड प्रेशर (बीपी) भी बढ़ सकता है, खासकर डायबिटीज या इंसुलिन रजिस्टेंस जैसी समस्याओं से ग्रसित लोगों में अधिक संभावना होती है। इंसुलिन रजिस्टेंस न सिर्फ शरीर में शुगर को इस्तेमाल करने के तरीके को प्रभावित करता है, बल्कि ये रक्त वाहिकाओं (ब्लड वेसल्स) के काम पर भी असर डालता है। इसकी वजह से नसों में सूजन आने लगती है, जिसके चलते नसें पतली होने लगती हैं। जिसका सीधा असर ब्लड सर्कुलेशन पर पड़ता है।

जब कोशिकाएं इंसुलिन का प्रतिरोध करती हैं, तो शरीर ज्यादा इंसुलिन बनाने लगता है। ज्यादा इंसुलिन से रक्त वाहिकाओं में बदलाव आ सकता है, जो हाई ब्लड प्रेशर के साथ हार्ट डिजीज के खतरे को भी बढ़ा सकता है। वहीं शुगर बढ़ने से सिम्पथेटिक नर्वस सिस्टम भी एक्टिव हो सकता है, जिसके चलते शरीर में हार्मोन्स के लेवल में असामान्य उतार-चढ़ाव हो सकता है, जो बाद में हाइपरटेंशन का कारण भी बन सकता है। इसका असर किडनी पर भी पड़ता है।

हालांकि ब्लड प्रेशर को सही रखने के लिए संतुलित आहार, कम मीठा, नियमित व्यायाम, वजन पर ध्यान देना और तनाव कम करने की आदतें डालनी चाहिएं। डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर वालों को अपने डॉक्टर से मिलकर अपनी सेहत के हिसाब से खास योजना बनानी चाहिए।

सामान्य ब्लड प्रेशर (BP) और शुगर लेवल क्यों जरूरी है?

बीपी(BP) और शुगर का लेवल सामान्य बनाए रखना हमारे संपूर्ण स्वास्थ के लिए बहुत ही जरूरी है। इनके असमान्य होने से हार्ट से जुड़ी बीमारियों, मधुमेह और महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित करने वाली परेशानियों का खतरा बढ़ सकता है।

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क्या चीनी की वजह से ब्लड प्रेशर बढ़ता है?

चीनी और ब्लड प्रेशर के बीच का संबंध काफी रुचि का विषय है, जिससे इस बात पर चर्चा होती है कि डाइट कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ को कैसे प्रभावित कर सकता है। सीधे तौर पर चीनी ब्लड प्रेशर के बढ़ने का कारण नहीं बन सकती है, लेकिन ज्यादा चीनी के सेवन से ये उन कारकों में योगदान कर सकता है जो हाई ब्लड प्रेशर के खतरे को बढ़ाते हैं।

इंसुलिन रेजिस्टेंस और ब्लड प्रेशर

एक्स्ट्रा शुगर और प्रोसेस्ड कार्ब के रूप में ज्यादा चीनी का सेवन इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ा सकता है। इंसुलिन रेजिस्टेंस तब होता है जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रभाव के प्रति कम क्रियाशील हो जाती हैं। इंसुलिन रेजिस्टेंस ब्लड वाहिका के काम और संरचना में बदलाव से जुड़ा हुआ है, जो ब्लड प्रेशर रेगुलेशन को प्रभावित कर सकता है।

सूजन और हाइपरटेंशन

एक्स्ट्रा शुगर से भरपूर डाइट भी पुरानी सूजन से जुड़ा हुआ हो सकता है, जो अलग-अलग तरह के हाइपरटेंशन सहित कई हेल्थ इश्यू का कारण हो सकता है। सूजन ब्लड वाहिकाओं की परत को नुकसान पहुंचा सकती हैं, उनका लचीलापन कम कर सकती हैं और ब्लड प्रेशर को सही ढंग से कंट्रोल करने की उनकी क्षमता को ख़राब कर सकती हैं।

सोडियम, बीपी और शुगर

हाई शुगर वाले डाइट अक्सर हाई सोडियम सेवन के साथ मेल खाते हैं, क्योंकि कई प्रोसेस्ड और शुगर प्रोडक्ट में भी नमक की मात्रा भरपूर होती है। अत्यधिक सोडियम के सेवन से फ्लूड रिटेशन और ब्लड की मात्रा बढ़ सकती है, जिस कारण ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है।

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संयममित और संतुलित तरीका

चीनी खाने और ब्लड प्रेशर तुरंत बढ़ने के बीच सीधा संबंध कम स्पष्ट हो सकता है, लेकिन वजन बढ़ने, इंसुलिन रेजिस्टेंस, सूजन और कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ पर ज्यादा शुगर सेवन के प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। संतुलित आहार, सीमित एक्स्ट्रा शुगर और सीमित प्रोसेस्ड  कार्बोहाइड्रेट, नियमित फिजिकल एक्टिविटी  बीपी(BP) और शुगर के लेवल को मैनेज करने के लिए एक अच्छा तरीका है।

तो इस प्रश्न का उत्तर देते समय कि “क्या चीनी ब्लड प्रेशर बढ़ाती है?” हम इस बात को ध्यान में रख सकते हैं कि अकेले चीनी ही ब्लड प्रेशर स्पाइक्स का एकमात्र कारण नहीं हो सकती है। कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ को प्रभावित करने वाले अन्य कारकों में संपूर्ण स्वास्थ्य को बनाए रखने में सावधानीपूर्वक चीनी के सेवन के महत्व को रेखांकित करता है।

निष्कर्ष

शुगर और हाइपरटेंशन के बीच संबंध हेल्थ मैनेजमेंट के महत्व को दर्शाता है। प्रभावी मैनेजमेंट के लिए रिस्क फैक्टर्स और प्रैक्टिकल स्ट्रेटजी से व्यक्ति सक्रिय रूप से इन स्थितियों को कंट्रोल कर सकते हैं। जीवनशैली में बदलाव, निगरानी और डिसीजन मेकिंग के माध्यम से हम बेहतर स्वास्थ्य और बेहतर जीवन की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या मधुमेह हाई ब्लड प्रेशर का कारण बन सकता है?

हां, लंबे समय से हाई ब्लड शुगर का लेवल और इंसुलिन रेजिस्टेंस ब्लड वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे संभावित रूप से हाई ब्लड प्रेशर हो सकता है।

मोटापा इन स्थितियों में कैसे असर डालता है?

मोटापा इंसुलिन रेजिस्टेंस के खतरे को बढ़ाता है और कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव डालता है, जिससे हाई ब्लड प्रेशर की संभावना बढ़ जाती है।

क्या शुगर और हाई ब्लड प्रेशर के बीच कोई आनुवंशिक संबंध है?

आनुवंशिकी(जेनेटिक्स) इन दोनों स्थितियों में भूमिका निभा सकती है, लेकिन लाइफस्टाइल भी उनके विकास को काफी प्रभावित करता है।

क्या एक चीज को मैनेज करने से दूसरी चीज को कंट्रोल करने में मदद मिल सकती है?

हां, एक स्वस्थ जीवनशैली जिसमें संतुलित भोजन और नियमित एक्सरसाइज शामिल हो को अपनाने से शुगर और  हाइपरटेंशन दोनों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

दोनों स्थिति एक साथ होने से क्या समस्याएं हैं?

शुगर और हाई ब्लड प्रेशर के संयोजन से हार्ट डिजीज, स्ट्रोक, किडनी की समस्या और विजन से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।Last Updated on by Dr. Damanjit Duggal 

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